20 Most Important Hormones

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Glands- ग्रन्थियाँ

(a) बहिःस्रावी ग्रन्थियाँ (Exocrine glands): जिन ग्रन्थियों से स्रावित Hormones अंगों तक नलिकाओं द्वारा पहुंचता है, उसे बहिःस्रावी ग्रन्थियां कहते हैं। बहिःस्रावी ग्रन्थियों को नालिकयुक्त ग्रन्थियां (Duct glands) भी कहते हैं। दुग्ध ग्रन्थि, लार ग्रन्थि, श्लेष्म ग्रन्थि, अश्रु ग्रन्थि आदि बहिःस्रावी ग्रन्थि के प्रमुख उदाहरण हैं।

(b) अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ (Endocrine Glands): जिन ग्रन्थियों से स्रावित Hormones अंगों तक बिना नलिकाओं अर्थात् रक्त प्लाज्मा के द्वारा पहुंचता है, उन्हें अन्तःस्रावी ग्रन्थियां कहते हैं। अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ नलिकाविहीन (Ductless) होती हैं।अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ नलिका (Duct) के अभाव में अपने स्राव को सीधे रुधिर परिसंचरण में मुक्त करती हैं। पीयूष ग्रन्थि, थाइरॉयड ग्रन्थि, अधिवृक्क ग्रन्थि, पैराथाइरॉयड ग्रन्थि पीनियल काय, थाइमस ग्रन्थि आदि प्रमुख अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ हैं।

End0crine glands

(c) मिश्रित ग्रन्थियाँ (Mixed glands): कुछ ग्रन्थियाँ ऐसी होती हैं जो बहिःस्रावी तथा अन्तःस्रावी दोनों ही प्रकार की होती हैं, उन्हें मिश्रित ग्रन्थियाँ कहते हैं। जैसे- अग्न्याशय (Pancreas)

पीयूष ग्रन्थि :-

 

यह ग्रन्थि खोपड़ी में हायपोथैलामस के पास ही स्थित होती है। पीयूष ग्रन्थि के दो अलग अलग कार्यत्मक भाग होते है पश्च पीयूष ग्रंथि और अग्र पीयूष ग्रंथि।इसका आकार एक मटर के दाने जैसा होता है और वजन 0.5 ग्राम (0.02 आउन्स) होता है।

 

 पीयूष ग्रंथि के आगे के हिस्से (Anterior pituitary) से निकलने वाले Hormones और कार्य-

थायराइड स्टीम्युलेटिंग हार्मोन या टीएसएच (Thyroid stimulating hormone or TSH) :

यह थायराइड ग्रंथि (Thyroid gland) पर कार्य करते हुए, इससे थायरोक्साइन (thyroxine) और ट्राई-आयोडोथायोनिन (tri-iodothyronine) को स्त्रावित करने में सहायक होता है।

 

लूटिनिसिंग हार्मोन या एलएच (Luteinising hormone or LH) :

यह हार्मोन अंडाशय/वृषण (Ovary/Testis) पर कार्य करता है। यह महिलाओं में अंडाशय में अंडा बनने और एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरोन बनने में मदद करता है।

फोलिकल स्टीम्युलेटिंग हार्मोन या एफएसएच (Follicle stimulating hormone or FSH) :

यह हार्मोन अंडाशय/वृषण (Ovary/Testis) पर कार्य करता है। यह महिलाओं में ओवुलेशन से पहले अंडाशय में अंडे और अंडाशय के फोलिकल्स (follicles) बनने में सहायक होता है, जबकि पुरुषों के वृषण में टेस्टोस्टेरोन बनाने में मददगार होता है।

 

वृद्धि हार्मोन (Growth hromone or somatotropic hormone): यह शरीर की वृद्धि विशेषतया हड्डियों की वृद्धि का नियंत्रण करता है। इसकी अधिकता से भीमकायता (Gigantism) अथवा एक्रोमिगली (Acromegaly) विकार उत्पन्न हो जाता है। इसके कारण मनुष्य की लम्बाई सामान्य से बहुत अधिक बढ़ जाती है तथा हड्डियाँ भारी व मोटी हो जाती हैं। बाल्यावस्था में इस हार्मोन के कम स्राव से शरीर की वृद्धि रुक जाती है। जिससे मनुष्य में बौनापन (Dwarfism) हो जाता है।

प्रोलैक्टिन या पीआरएल (prolactin or PRL) :

यह हार्मोन महिलाओं के स्तन और मस्तिष्क पर कार्य करता है। इसका कार्य महिलाओं में दूध बनाना और यौन स्वास्थ्य में अहम मुख्य भूमिका निभाना है।

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एड्रेनोकॉर्टिकोट्रोफिक हार्मोन या एसीएचटी (Adrenocorticotrophic hormone or ACTH) :

यह हार्मोन पीयूष ग्रंथि के आगे के हिस्सा (Anterior pituitary के हिस्से पर कार्य करता है। ये मुख्य रूप से कोर्टिसोल बनाने के लिए एड्रेनल ग्रंथियों को उत्तेजित करता है।

पीयूष ग्रंथि के पीछे के हिस्से (Posterior pituitary) से निकलने वाले Hormones और कार्य –  

वैसोप्रीसिन  Vasopressin “एंटी-डाईयूरेटिक हार्मोन” या एडीएच (Anti diuretic hormone or ADH) :

यह हार्मोन गुर्दे के द्वारा आवश्यक तरल पदार्थ का सतुलन बनाये रखता है और रक्त वाहिकाओं के संकुचित होने में मदद करता है, जिससे रक्तचाप नियंत्रित बना रहता है।शराब पीने पर यह हॉर्मोन कम हो जाता है जिसके कारण शराबी व्यक्ति को बार बार urine आता है।

 

ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) :

यह महिलाओं में दूध नलिकाओं से दूध उत्पादन करने और प्रसव (labour) के दौरान गर्भाशय संकुचन में मदद करता है।इसे love या cuddle हॉर्मोन भी कहते है।

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पीनियल ग्रंथि

पीनियल ग्रंथि को ‘तीसरी आंख’ भी कहा जाता है, पीनियल ग्रंथि मध्यमस्तिष्क के केंद्र में  स्थित एक छोटी ग्रंथि है। अपने पिनकोन आकार के कारण यह पीनियल कहलाती है।

पीनियल ग्रंथि को शरीर की आंतरिक घड़ी कहा जाता है क्योंकि यह शरीर के सर्कैडियन लय (circadian rhythm)को नियंत्रित करता है।

पीनियल ग्रंथि मेलाटोनिन Hormone को स्रावित करती है, जो एक हार्मोन है जो सर्कैडियन लय को विनियमित(Regulate)  करने में मदद करता है। मेलाटोनिन का उत्पादन एक व्यक्ति द्वारा प्रकाश की मात्रा के अनुसार किया जाता है।

पीनियल ग्रंथि डार्क होने पर मेलाटोनिन की अधिक मात्रा छोड़ती है, जो नींद आने में सहायक है।

अवटु ग्रन्थि (थॉयराइड) :

यह ग्रन्थि श्वास नली या ट्रैकिया (Trachea) के दोनों तरफ लैरिंक्स (Larynx) के नीचे स्थित रहती है।

थाइरॉक्सिन (Thyroxine T3, T4 ): यह Hormones कोशिकीय श्वसन की गति को तीव्र करता है। यह शरीर की सामान्य वृद्धि विशेषतया हड्डियों, बाल इत्यादि के विकास के लिए अनिवार्य है।

बच्चों में थाइरॉक्सिन की कमी के कारण अवटुवामनता (Cretinism) नामक रोग उत्पन्न हो जाता है।

यौवनावस्था (Puberty) के पश्चात इस हार्मोन की कमी के कारण शरीर में मिक्सिडिमा (Myxedema) नामक रोग उत्पन्न होता है।

मनुष्य में एक लम्बे समय तक इस हार्मोन की कमी के कारण हाइपोथाइरॉयडिज्म (Hypothyroidism) रोग उत्पन्न हो जाता है।

भोजन में आयोडीन की कमी के कारण घेघा या ग्वाइटर (Goitre) नामक रोग हो जाता है।

थाइरॉक्सिन की अधिकता के कारण ऑख फूलकर नेत्रकोटर से बाहर निकल जाती है। इस रोग को एक्सोप्थेलमिक ग्वाइटर (Exophthalmic goitre) कहते हैं।

परावटु ग्रन्थि (Parathyroid glands):

ये मटर की आकृति की पालियुक्त (Lobed) ग्रन्थियाँ हैं। ये थाइरॉइड ग्रन्थि के पीछे स्थित रहती है

(i) पैराथाइरॉइड हार्मोन (Parathyroid hormone)- यह हार्मोन उस समय मुक्त होता है, जब रक्त में कैल्सियम की कमी हो जाती है। यह हार्मोन कैल्सियम के अवशोषण तथा वृक्क में इसके पुनरावशोषण (Reabsorption) को बढ़ाता है। यह हड्डियों की वृद्धि एवं दाँतों के निर्माण का नियंत्रण करता है।

(ii) कैल्सिटोनिन हार्मोन (Calcitonin hormone): जब रक्त में कैल्सियम की मात्रा अधिक हो जाती है, तब यह हार्मोन मुक्त होता है। यह हार्मोन पैराथाइरॉइड हार्मोन के विपरीत काम करता है। यह हड्डियों के विघटन को कम करता है तथा मूत्र में कैल्सियम का उत्सर्जन बढ़ाता है।

Complete nervous System-तन्त्रिका तन्त्र

अधिवृक्क ग्रन्थि (Adrenal gland):

अधिवृक्क ग्रन्थि को  सुप्रारेनल ग्लैंड के नाम से भी जाना जाता है। यह ग्रन्थि प्रत्येक वृक्क के ऊपरी सिरे पर अंदर की ओर स्थित रहती है।  अधिवृक्क ग्रन्थि के दो भाग होते हैं-

(A) बाहरी भाग-कॉर्टेक्स (Cortex)

(B) अंदरुनी भाग-मेड्युला (Medulla)

एड्रीनल कॉर्टेक्स द्वारा स्रावित Hormones एवं उनके कार्य:इसके द्वारा स्रावित हार्मोनों को निम्नलिखित तीन समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है-

(i) ग्लूकोकॉर्टिक्वायर्डस (Glucocorticoids): भोजन उपापचय में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन एवं वसा के उपापचय का नियंत्रण करते हैं।

ये हार्मोन प्रदाह-विरोधी (Anti inflammatory) होते हैं, जिसके लिए ये श्वेत रुधिराणुओं पर नियंत्रण कर उत्तेजक पदार्थों के प्रति सुरक्षा प्रतिक्रियाओं को रोकते हैं।

(ii) मिनरलोकॉर्टिक्वायर्डस (Mineralocorticoids): इनका मुख्य कार्य वृक्क नलिकाओं द्वारा लवण के पुनः अवशोषण एवं शरीर में अन्य लवणों की मात्रा का नियंत्रण करना है। ये शरीर में जल संतुलन को भी नियंत्रित करते हैं। इसके प्रभाव से मूत्र द्वारा पोटैशियम और फॉस्फेट का अधिक मात्रा में उत्सर्जन और सोडियम क्लोराइड एवं जल का कम मात्रा में उत्सर्जन होता है।

(iii) लिंग हार्मोन (sex hormones): ये हार्मोन पेशियों तथा हड्डियों के परिवर्धन, बाह्यलिंगों, बालों के आने का प्रतिमान एवं यौन आचरण का नियंत्रण करते हैं। ये हार्मोन मुख्यतः नर हार्मोन एन्ड्रोजन्स (Androgens) तथा मादा हार्मोन एस्ट्रोजन्स (Estrogens) होते हैं।

 

Hormone

 एड्रीनल मेडुला द्वारा स्रावित हार्मोन व उनके कार्य: एड्रीनल मेडुला से निम्नलिखित दो हार्मोनों का स्त्राव होता है-

(i) एड्रीनेलीन (Adrenalin): इस हार्मोन को एड्रीनिन (Adrenin) एवं एपिनेफ्रीन (Epineprin) भी कहते हैं। यह हार्मोन मेडुला से स्रावित हार्मोन का अधिकांश भाग होता है। यह हार्मोन क्रोध, डर, मानसिक तनाव एवं व्यस्तता की अवस्था में अत्यधिक स्रावित होने लगता है, जिससे इन संकटकालीन परिस्थितियों में उचित कदम उठाने का निर्णय लिया जा सकता है। यह हृदय स्पंदन की दर को बढ़ाता है। यह हार्मोन रोंगटे खड़े होने के लिए प्रेरित करता है। यह आँख की पुतलियों को फैलाता है। अधिवृक्क ग्रन्थि से निकलने वाले इस हार्मोन को लड़ो और भागो हार्मोन कहा जाता है।

 

(ii)नॉर एड्रीनेलीन या नॉरएपिनेफ्रिन -Noradrenalin or Norepinephrine ये सामान रूप से हृदय पेशियों की उत्तेजनशीलता एवं संकुचनशीलता को तेज करते हैं। परिणामस्वरूप रक्त चाप (Blood pressure) बढ़ जाता है।

यह हृदय स्पंदन के एकाएक रुक जाने पर उसे पुनः चालू करने में सहायक होता है।

एड्रीनल के अल्पस्रवण से होने वाले रोग:

  • एडीसन रोग (Addison’s disease):इस रोग में रुधिर दाब कम हो जाता है तथा सोडियम एवं जल का उत्सर्जन बढ़ जाता है जिससे निर्जलीकरण (Dehydration) हो जाता है। चेहरे, गर्दन एवं त्वचा पर जगह-जगह चकते पड़ जाते हैं।
  • (ii) कॉन्स रोग (Conn’s disease): यह रोग सोडियम एवं पोटैशियम की कमी से हो जाता है। इस रोग में पेशियों में अकड़न आ जाती है एवं रोगी की मृत्यु भी हो जाती है।

एड्रीनल के अतिस्रवण से होने वाले रोग:

  • कुशिंग रोग (Cushing disease):इस रोग में शरीर में जल एवं सोडियम का जमाव अधिक हो जाता है। पेशीय शिथिलन होने लगता है। प्रोटीन केटाबलिज्म (Protein catabolism) बढ़ जाता है तथा हड्डियाँ अनियमित हो जाती हैं।
  • (ii) एड्रीनल विरिलिज्म (Adrenal virilism):इस रोग में स्त्रियों में पुरुषों के लक्षण बनने लगते हैं। इसमें स्त्रियों के चेहरे पर दाढ़ी व मूंछों का आना, आवाज मोटी हो जाना, बाँझपन उत्पन्न हो जाना इत्यादि होते हैं।

 

थाइमस ग्रन्थि (Thymus gland):

यह ग्रंथि वक्ष में हृदय से आगे स्थित होती है। यह ग्रंथि वृद्धावस्था में लुप्त हो जाती है। यह गुलाबी, चपटी एवं द्विपालित (Bilobed) ग्रन्थि है।

थाइमस ग्रन्थि से स्रावित Hormone व उनके कार्य: थाइमस ग्रन्थि से निम्नलिखित हार्मोनों का स्राव होता है– (i) थाइमोसीन (Thymosin), (ii) थाइमीन-I (Thymin-I), (iii) थाइमीन-II (Thymin-II)

ये हार्मोन शरीर में लिम्फोसाइट कोशिकाएँ के परिपक्क होने में सहायक होती हैं। ये हार्मोन लिम्फोसाइट को जीवाणुओं एवं एन्टीजन्स (Antigens) को नष्ट करने के लिए प्रेरित करती हैं। ये शरीर में एन्टीबॉडी बनाकर शरीर की सुरक्षा तंत्र स्थापित करने में सहायक होती हैं।

जनन ग्रन्थियाँ (Gonads):

जनन ग्रन्थियाँ जनन कोशिकाओं के निर्माण के अलावा अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के रूप में भी कार्य करती है।

(A) अण्डाशय (Ovary): इसके द्वारा निम्नलिखित हार्मोनों का स्राव होता है-

(i) एस्ट्रोजन (Estrogen): यह एस्टेरॉयड (Steroid) होता है

यह हार्मोन यौवनावस्था में यौन लक्षणों जैसे- गर्भाशय (Uterus), योनि (vagina), व breast के विकास को प्रेरित करता है।इस हार्मोन की कमी के कारण जनन क्षमता क्षीण हो जाती है, रजनोवृति (Menopause) का आभास होने लगता है तथा स्तन ढलने लगता है।

(ii) प्रोजेस्टेरॉन (Progesteron): इस हार्मोन का स्राव प्रति पिण्ड या कॉर्पसल्यूटियम (Corpus luteum) की कोशिकाओं द्वारा होता है। यह एस्ट्रोजेन से सहयोग कर स्तन के विकास एवं दुग्ध ग्रन्थियों को सक्रिय करता है। इसके अतिरिक्त यह गर्भावस्था एवं प्रसव में होने वाले परिवर्तनों से भी सम्बद्ध होता है। अत: यह हार्मोन गर्भधारण के निर्धारण वाला हार्मोन कहलाता है।

(iii) रिलैक्सिन (Relaxin): यह हार्मोन भी कॉर्पस ल्यूटियम (Corpus luteum) द्वारा स्रावित होता है। गर्भावस्था में यह अण्डाशय, गर्भाशय एवं अपरा (Placenta) में उपस्थित रहता है। यह गर्भाशय को सिकुड़ने से रोकता है। यह गर्भाशय ग्रीवा (Uterine cervix) को चौड़ा करता है। इससे बच्चे के जन्म में सहायता मिलती है।

(B) वृषण (Testes): यह नर जनन अंग है। यह शरीर के बाहर स्क्रोटल कोष (scrotal sae) में स्थित होते हैं। वृषण के अंदर स्थित अन्तराली कोशिकाओं (Interstitial cells) या लीडिंग कोशिकाओं (Leyding cells) से नर हार्मोन स्रावित होते हैं, जिन्हें एण्ड्रोजेन (Androgen) कहते हैं। सबसे प्रमुख एन्ड्रोजेन हार्मोन को टेस्टोस्टेरॉन (Testosteron) कहते हैं। यह हार्मोन पुरुषोचित लैंगिक लक्षणों के परिवर्द्धन को एवं यौन-आचार को प्रेरित करता है।

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